Tuesday, 21 January 2020

गीता स्वाध्याय अध्याय एक - श्लोक 20


नित्य गीता स्वाध्याय
प्रतिदिन एक श्लोक श्रीमद्-भगवद्-गीता यथारूप से
अध्याय एक - कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण

श्लोक  20

अथ व्यवस्थितान् दृष्ट्वा धार्तराष्ट्रान्कपिध्वज:
प्रवृत्ते शस्त्रसम्पाते धनुरुद्यम्य पाण्डव:
हृषीकेशं तदा वाक्यमिदमाह महीपते

शब्दार्थ

अथ - तत्पश्चात्; व्यवस्थितान् - स्थित;  दृष्ट्वा - देखकर; धार्तराष्ट्रान् - धृतराष्ट्र के पुत्रों को; कपि-ध्वज: - जिसकी पताका पर हनुमान अंकित हैं; प्रवृत्ते - कटिबद्ध; शस्त्रसम्पाते - बाण चलाने के लिए; धनु: - धनुष; उद्यम्य - ग्रहण करके, उठाकर; पाण्डव: - पाण्डुपुत्र (अर्जुन) ने; हृषीकेशम् - भगवान् कृष्ण से; तदा - उस समय; वाक्यम् - वचन; इदम् - ये; आह - कहे; मही-पते - हे राजा।

अनुवाद

उस समय हनुमान से अंकित ध्वजा लगे रथ पर आसीन पाण्डुपुत्र अर्जुन अपना धनुष उठा कर तीर चलाने के लिए उद्यत हुआ। हे राजन्! धृतराष्ट्र के पुत्रों को व्यूह में खड़ा देखकर अर्जुन ने श्रीकृष्ण से ये वचन कहे।

तात्पर्य

युद्ध प्रारम्भ होने ही वाला था। उपर्युक्त कथन से ज्ञात होता है कि पाण्डवों की सेना की अप्रत्याशित व्यवस्था से धृतराष्ट्र के पुत्र बहुत कुछ निरुत्साहित थे क्योंकि युद्धभूमि में पाण्डवों का निर्देशन भगवान् कृष्ण के आदेशानुसार हो रहा था।

अर्जुन की ध्वजा पर हनुमान का चिह्न भी विजय का सूचक है क्योंकि हनुमान ने राम तथा रावण युद्ध में राम की सहायता की थी जिससे राम विजयी हुए थे। इस समय अर्जुन की सहायता के लिए उनके रथ पर राम तथा हनुमान दोनों उपस्थित थे। भगवान् कृष्ण साक्षात् राम हैं और जहाँ भी राम रहते हैं वहाँ उनका नित्य सेवक हनुमान होता है तथा उनकी नित्यसंगिनी, वैभव की देवी सीता उपस्थित रहती हैं।

अतः अर्जुन के लिए किसी भी शत्रु से भय का कोई कारण नहीं था। इससे भी अधिक इन्द्रियों के स्वामी भगवान् कृष्ण निर्देश देने के लिए साक्षात् उपस्थित थे।

इस प्रकार अर्जुन को युद्ध करने के मामले में सारा सत्परामर्श प्राप्त था। ऐसी स्थितियों में, जिनकी व्यवस्था भगवान् ने अपने शाश्वत भक्त के लिए की थी, निश्चित विजय के लक्षण स्पष्ट थे।

स्रोत
"भगवद्-गीता यथारूप"
सम्पूर्ण विश्व में भगवद्-गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध तथा प्रामाणिक संस्करण

✒ लेखक
कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद्
ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद
आधुनिक युग में विश्वव्यापक हरे कृष्ण आन्दोलन के प्रणेता तथा वैदिक ज्ञान के अद्वितीय प्रचारक
प्रेषक : वेदान्त-विज्ञानम्
"एवं परम्पराप्राप्तम्" - गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त परम विज्ञान

Monday, 20 January 2020

गीता स्वाध्याय अध्याय एक - श्लोक 19


नित्य गीता स्वाध्याय

प्रतिदिन एक श्लोक श्रीमद्-भगवद्-गीता यथारूप से
अध्याय एक - कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण

श्लोक 19

घोषो धार्तराष्ट्राणां हृदयानि व्यदारयत्
नभश्च पृथिवीं चैव तुमुलोऽभ्यनुनादयन्

शब्दार्थ

: - उस; घोष: - शब्द ने; धार्तराष्ट्राणाम् - धृतराष्ट्र के पुत्रों के; हृदयानि - हृदयों को; व्यदारयत् - विदीर्ण कर दिया; नभ: - आकाश; - भी; पृथिवीम् - पृथ्वीतल को; - भी; एव - निश्चय ही; तुमुल: - कोलाहलपूर्ण; अभ्यनुनादयन् - प्रतिध्वनित करता, शब्दायमान करता।

अनुवाद

इन विभिन्न शंखों की ध्वनि कोलाहलपूर्ण बन गई जो आकाश तथा पृथ्वी को शब्दायमान करती हुई धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदयों को विदीर्ण करने लगी।

तात्पर्य

जब भीष्म तथा दुर्योधन के पक्ष के अन्य वीरों ने अपने-अपने शंख बजाये तो पाण्डवों के हृदय विदीर्ण नहीं हुए। ऐसी घटनाओं का वर्णन नहीं मिलता किन्तु इस विशिष्ट श्लोक में कहा गया है कि पाण्डव पक्ष के शंखनाद से धृतराष्ट्र के पुत्रों के हृदय विदीर्ण हो गए।

इसका कारण स्वयं पाण्डव और भगवान् कृष्ण में उनका विश्वास है।

परमेश्वर की शरण ग्रहण करने वाले को किसी प्रकार का भय नहीं रह जाता चाहे वह कितनी ही विपत्ति में क्यों हो।

स्रोत
"भगवद्-गीता यथारूप"
सम्पूर्ण विश्व में भगवद्-गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध तथा प्रामाणिक संस्करण

✒ लेखक
कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद्
ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद
आधुनिक युग में विश्वव्यापक हरे कृष्ण आन्दोलन के प्रणेता तथा वैदिक ज्ञान के अद्वितीय प्रचारक
प्रेषक : वेदान्त-विज्ञानम्
"एवं परम्पराप्राप्तम्" - गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त परम विज्ञान

Wednesday, 15 January 2020

गीता स्वाध्याय अध्याय एक - श्लोक 16 - 18


नित्य गीता स्वाध्याय

प्रतिदिन एक श्लोक श्रीमद्-भगवद्-गीता यथारूप से
अध्याय एक - कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण

श्लोक 16-18
अनन्तविजयं राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:
नकुल: सहदेवश्च सुघोषमणिपुष्पकौ

काश्यश्च परमेष्वास: शिखण्डी महारथ:
धृष्टद्युम्नो विराटश्च सात्यकिश्चापराजित:

द्रुपदो द्रौपदेयाश्च सर्वश: पृथिवीपते
सौभद्रश्च महाबाहु: शङ्खान्दध्मु: पृथक्पृथक्

शब्दार्थ

अनन्त-विजयम् - अनन्त विजय नाम का शंख; राजा - राजा; कुन्ती-पुत्र: - कुन्ती के पुत्र; युधिष्ठिर: - युधिष्ठिर; नकुल: - नकुल; सहदेव: - सहदेव ने; - तथा; सुघोषमणिपुष्पकौ - सुघोष तथा मणिपुष्पक नामक शंख;

काश्य: - काशी (वाराणसी) के राजा ने; - तथा; परम-इषु-आस: - महान धनुर्धर; शिखण्डी - शिखण्डी ने; - भी; महा-रथ: - हजारों से अकेले लड़ने वाले; धृष्टद्युम्न: - धृष्टद्युम्न (राजा द्रुपद के पुत्र) ने; विराट: - विराट (राजा जिसने पाण्डवों को उनके अज्ञात-वास के समय शरण दी) ने; - भी; सात्यकि: - सात्यकि (युयुधान, श्रीकृष्ण के साथी) ने; -  तथा; अपराजित: - कभी जीता जाने वाला, सदा विजयी;

द्रुपद: - द्रुपद, पंचाल के राजा ने; द्रौपदेया: - द्रौपदी के पुत्रों ने; - भी; सर्वश: - सभी; पृथिवी-पते - हे राजा; सौभद्र: - सुभद्रापुत्र अभिमन्यु ने; - भी; महा-बाहु: - विशाल भुजाओं वाला; शङ्खान् - शंख; दध्मु: - बजाए; पृथक् पृथक् - अलग अलग।

अनुवाद

हे राजन्! कुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर ने अपना अनन्तविजय नामक शंख बजाया तथा नकुल और सहदेव ने सुघोष एवं मणिपुष्पक शंख बजाये।

महान् धनुर्धर काशीराज, परम योद्धा शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट, अजेय सात्यकि, द्रुपद, द्रौपदी के पुत्र तथा सुभद्रा के महाबाहु पुत्र आदि सब ने अपने-अपने शंख बजाये।

तात्पर्य

संजय ने राजा धृतराष्ट्र को अत्यन्त चतुराई से यह बताया कि पाण्ड़ु के पुत्रों को धोखा देने तथा राज्यसिंहासन पर अपने पुत्रों को आसीन कराने की यह अविवेकपूर्ण नीति श्लाघनीय नहीं थी।

लक्षणों से पहले से ही यह सूचित हो रहा था कि इस महायुद्ध में सारा कुरुवंश मारा जायेगा। भीष्म पितामह से लेकर अभिमन्यु तथा अन्य पौत्रों तक विश्व के अनेक देशों के राजाओं समेत उपस्थित सारे के सारे लोगों का विनाश निश्चित था।

यह सारी दुर्घटना राजा धृतराष्ट्र के कारण होने जा रही थी क्योंकि उसने अपने पुत्रों की कुनीति को प्रोत्साहन दिया था।

स्रोत
"भगवद्-गीता यथारूप"
सम्पूर्ण विश्व में भगवद्-गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध तथा प्रामाणिक संस्करण

✒ लेखक
कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद्
ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद
आधुनिक युग में विश्वव्यापक हरे कृष्ण आन्दोलन के प्रणेता तथा वैदिक ज्ञान के अद्वितीय प्रचारक
प्रेषक : वेदान्त-विज्ञानम्
"एवं परम्पराप्राप्तम्" - गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त परम विज्ञान

Tuesday, 14 January 2020

गीता स्वाध्याय अध्याय एक - श्लोक 15


नित्य गीता स्वाध्याय
प्रतिदिन एक श्लोक श्रीमद्-भगवद्-गीता यथारूप से
अध्याय एक - कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में सैन्यनिरीक्षण

श्लोक 15
पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जय:
पौण्ड्रं दध्मौ महाशङ्खं भीमकर्मा वृकोदर:

शब्दार्थ
पाञ्चजन्यम् - पाञ्चजन्य नामक; हृषीक-ईश: - हृषीकेश (कृष्ण जो भक्तों की इन्द्रियों को निर्देश करते हैं) ने; देवदत्तम् - देवदत्त नामक शंख; धनम्-जय: - धनञ्जय (अर्जुन, धन को जीतने वाला) ने; पौण्ड्रम् - पौण्ड्र नामक शंख; दध्मौ - बजाया; महा-शङ्खम् - भीषण शंख; भीम-कर्मा - अतिमानवीय कर्म करने वाले; वृकउदर: - (अतिभोजी) भीम ने।
अनुवाद
भगवान् कृष्ण ने अपना पाञ्चजन्य शंख बजाया, अर्जुन ने देवदत्त शंख तथा अतिभोजी एवं अतिमानवीय कार्य करने वाले भीम ने पौण्ड्र नामक भयंकर शंख बजाया।
तात्पर्य
इस श्लोक में भगवान् कृष्ण को हृषीकेश कहा गया है क्योंकि वे ही समस्त इन्द्रियों के स्वामी हैं।
सारे जीव उनके भिन्नांश हैं अतः जीवों की इन्द्रियाँ भी उनकी इन्द्रियों के अंश हैं। चूँकि निर्विशेषवादी जीवों की इन्द्रियों का कारण बताने में असमर्थ हैं इसीलिए वे जीवों को इन्द्रियरहित या निर्विशेष कहने के लिए उत्सुक रहते हैं।
भगवान् समस्त जीवों के हृदयों में स्थित होकर उनकी इन्द्रियों का निर्देशन करते हैं। किन्तु वे इस तरह निर्देशन करते हैं कि जीव उनकी शरण ग्रहण कर ले और विशुद्ध भक्त की इन्द्रियों का तो वे प्रत्यक्ष निर्देशन करते हैं।

यहाँ कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में भगवान् कृष्ण अर्जुन की दिव्य इन्द्रियों का निर्देशन करते हैं इसीलिए उनको हृषीकेश कहा गया है।
भगवान् के विविध कार्यों के अनुसार उनके भिन्न-भिन्न नाम हैं। उदाहरणार्थ, इनका एक नाम मधुसूदन है क्योंकि उन्होंने मधु नाम के असुर को मारा था, वे गौवों तथा इन्द्रियों को आनन्द देने के कारण गोविन्द कहलाते हैं, वसुदेव के पुत्र होने के कारण इनका नाम वासुदेव है, देवकी को माता रूप में स्वीकार करने के कारण इनका नाम देवकीनन्दन है, वृन्दावन में यशोदा के साथ बाल-लीलाएँ करने के कारण ये यशोदानन्दन हैं, अपने मित्र अर्जुन का सारथी बनने के कारण पार्थसारथी हैं।
इसी प्रकार उनका एक नाम हृषीकेश है, क्योंकि उन्होंने कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में अर्जुन का निर्देशन किया।
इस श्लोक में अर्जुन को धनञ्जय कहा गया है क्योंकि जब इनके बड़े भाई को विभिन्न यज्ञ सम्पन्न करने के लिए धन की आवश्यकता हुई थी तो उसे प्राप्त करने में इन्होंने सहायता की थी।
इसी प्रकार  भीम वृकोदर कहलाते हैं क्योंकि जैसे वे अधिक खाते हैं उसी प्रकार वे अतिमानवीय कार्य करने वाले हैं, जैसे हिडिम्बासुर का वध।
अतः पाण्डवों के पक्ष में श्रीकृष्ण इत्यादि विभिन्न व्यक्तियों द्वारा विशेष प्रकार के शंखों का बजाया जाना युद्ध करने वाले सैनिकों के लिए अत्यन्त प्रेरणाप्रद था।
विपक्ष में ऐसा कुछ था; तो परम निदेशक भगवान् कृष्ण थे, ही भाग्य की देवी (श्री) थीं। अतः युद्ध में उनकी पराजय पूर्वनिश्चित थी - शंखों की ध्वनि मानो यही सन्देश दे रही थी।

स्रोत
"भगवद्-गीता यथारूप"
सम्पूर्ण विश्व में भगवद्-गीता का सर्वाधिक प्रसिद्ध तथा प्रामाणिक संस्करण

✒ लेखक
कृष्णकृपामूर्ति श्री श्रीमद्
ए. सी. भक्तिवेदान्त स्वामी प्रभुपाद
आधुनिक युग में विश्वव्यापक हरे कृष्ण आन्दोलन के प्रणेता तथा वैदिक ज्ञान के अद्वितीय प्रचारक
प्रेषक : वेदान्त-विज्ञानम्
"एवं परम्पराप्राप्तम्" - गुरु-परम्परा द्वारा प्राप्त परम विज्ञान